यादों में कल्याणजीः 'इस लाइन में दर्द कम लग रहा है…' एहसास को संगीत में उतारने वाला फनकार

Jun 30, 2026 - 21:34
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यादों में कल्याणजीः 'इस लाइन में दर्द कम लग रहा है…' एहसास को संगीत में उतारने वाला फनकार

हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार कल्याणजी ने आनंदजी के साथ मिलकर अपने दौर में फिल्म संगीत को एक नई पहचान दी। कहा जाता है कि एक बार मुंबई के स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के दौरान कल्याणजी ने अचानक गाना रोक दिया था और कहा था, ''इस लाइन में दर्द कम लग रहा है, ये ऐसे नहीं चलेगा।'' उन्होंने खुद उसी लाइन को गाकर समझाया कि भाव कैसा होना चाहिए। उनके लिए संगीत दिल की गहराई से जुड़ा एहसास था।

कल्याणजी वीरजी शाह का जन्म 30 जून 1928 को गुजरात के कच्छ में हुआ था। उनका परिवार बाद में मुंबई आ गया, जहां उनके पिता वीरजी शाह ने किराने की दुकान शुरू की। बचपन में कल्याणजी का सपना संगीतकार बनने का था, लेकिन उस समय उनके पास किसी बड़े उस्ताद से संगीत सीखने का साधन नहीं था। उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया, जब एक ग्राहक ने उधारी के बदले उन्हें और उनके भाई आनंदजी को संगीत सिखाने की पेशकश कर दी। यही साधारण सा सौदा आगे चलकर भारतीय संगीत के इतिहास का बड़ा मोड़ बन गया।

संगीत सीखने के बाद दोनों भाइयों ने 'कल्याणजी वीरजी एंड पार्टी' नाम से एक ऑर्केस्ट्रा बनाया और मुंबई समेत कई शहरों में स्टेज शो करने लगे। धीरे-धीरे उनकी पहचान बढ़ने लगी और उन्हें फिल्मों में काम मिलने लगा। उनका फिल्मी सफर 1959 में आई 'सम्राट चंद्रगुप्त' से शुरू हुआ। इसी साल उन्होंने 'सट्टा बाजार' और 'मदारी' जैसी फिल्मों में भी संगीत दिया।

लेकिन, उन्हें पहचान 1960 की फिल्म 'छलिया' के गानों से मिली, जिनमें 'डम डम डिगा डिगा' जैसे गीत बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद 1965 में 'हिमालय की गोद में' और 'जब जब फूल खिले' जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरहिट संगीतकारों की लिस्ट में शामिल कर दिया। 'ये समा, समा है प्यार का', 'पल पल दिल के पास', 'यारी है ईमान मेरा', 'ओ साथी रे', 'कसमें वादे प्यार वफा' और 'चांद सी महबूबा हो मेरी' जैसे गीत आज भी लोगों की यादों में बसे हैं।

1967 की फिल्म 'उपकार' का गीत 'मेरे देश की धरती' लोगों के अंदर देशभक्ति जगा देता है। इस गाने को रिकॉर्ड करने में काफी लंबा समय लगा था और इसमें लाइव साउंड का इस्तेमाल किया गया था। 1970 के दशक में उनका सुनहरा दौर आया। 'डॉन', 'कोरा कागज', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'सफर' और 'जंजीर' जैसी फिल्मों ने उनके करियर को ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।

कल्याणजी की खासियत यह थी कि वह संगीत को महसूस करते थे। वह हर लाइन में दर्द, खुशी या भावना को परखते थे। वे कई बार रिकॉर्डिंग रोककर कलाकारों को सही भाव समझाते थे। कई गायकों ने बताया है कि उनके साथ काम करना सीखने जैसा अनुभव होता था, क्योंकि वे हर छोटी चीज को बहुत गहराई से समझाते थे।

उनकी जोड़ी ने लगभग 250 फिल्मों में संगीत दिया और वे उस दौर के सबसे सफल संगीतकारों में गिने जाते हैं। उन्हें 1968 में 'सरस्वतीचंद्र' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और 1975 में 'कोरा कागज' के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। 1992 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। कल्याणजी का निधन 24 अगस्त 2000 को मुंबई में हुआ। लेकिन उनकी बनाई धुनें आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।

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